Tuesday, May 24, 2016

एकांत

इंसाफ का पक्का
भेद-भाव से परे
अकेलापन सच्चा है सौ टका
भीड़ में
या अकेले में
आके साथ हो लेता है कहीं भी 
कभी भी

एकाकी एकांत
चाहो तो करीब है
न चाहो
तो इतना लम्बा फ़ासला
जो नापे न नपे
कहीं भी
कभी भी

महाभूत

आज मैंने सौ रूपए की मिटटी ख़रीदी
कल ही २० रूपए/लीटर पानी ख़रीदा

१४.२ लीटर के ५१८ रुपये
१०.२ लीटर के ७००० रुपये 
इन दामों पर आग और हवा भी खरीदी है

ढूंढूं ज़रा
के कितने का बिकता है
मेरे हिस्से का आसमां

Thursday, July 9, 2015

एक मैगी प्रेमी की टेर

यूँ ही अचानक एक दिन
गु़म से हो जाओगे
ज़रा सा भी इसका साया होता,
तो तुम्हें कुछ और चाव से खाया होता

पानी थोड़ा कम ही मिलाया होता
कढ़ाई में चम्मच और प्यार से घुमाया होता
स्टील की प्लेट नही,
चाँदी में सजाया होता,
तुम्हें कुछ और चाव से खाया होता

तेरी सुनहरी लटों को
फोर्क पर नही, पलकों पे बिठाया होता,
निहारा होता
सँवारा होता
ज़रा और फ़ू फ़ू कर के
सुर्रर्रर्रर्र से गटकाया होता
तुम्हें कितने चाव से खाया होता

मिल जाओ कहीं तो कसम से
अदालत में एक डाइलाग ज़रूर टिकाया होता
'ग़र मैगी खाना जुर्म है माइ लाड तो ये जुर्म मैंने किया है'
जज को यूँ दो टूक सुनाया होता

कावेरी हो या औली
तवांग या बमरौली
तुम्हे हर जगह मैंने पाया होता 
कितने चाव से खाया होता
ओह मैगी,
तुम्हें कितने चाव से खाया होता!!


Friday, October 11, 2013

जादुई जेबखर्च

मुझे जेबखर्च मिलता है। और जेबखर्च में मिलते हैं २४ घंटे।

रोज़ के रोज़।

मेरी बुद्धि, ज़रुरत और इच्छा के अनुसार मैं उन २४ घंटों को खर्च करती हूँ। जादुई जेबखर्च है ये।

रोज़ मन भर के खर्च करने पर भी कुछ न कुछ घंटे बच ही जाते हैं। बचत भी ऐसी के न किसी खाते में जमा कर सके कोई और न ही ब्याज खा सके।

हर दिन की बची  पूँजी को आँखें मूँद कर वापस कर देती हूँ; उसी को जिसने दिए थे।
बही-खाता बराबर।

फिर अगली सुबह मेरे हाथों में वही जादुई जेबखर्च रख दिया जाता है। पूरे २४ घंटे।

Monday, March 25, 2013

What Sindhutai Sapkal said...(marathi)

दुःखा ने दुःख पटकन टिपता येता.

माणुस कधीच वाईट नसतो, माणसाच्या पोटाची भूख वाईट असते.

बाई नहीं तर काही नहीं.

तुम्ही तरी घरी बायकोला कधीतरी 'थकलीस का' म्हणत ज़ा ना.

जब तक गाल पे गोश्त तब तक यार भी दोस्त.

मला ज़गताना त्रास नाही जहाला, पुस्तक लिहताना जहाला.

घरामध्ये कोन्हाला काय अवड्त ते तिला पाठ अस्त पण तिला काय अवड्त ते कुन्हाला माहिती पण नस्त.

आजच्या जगात 'भाषण नाही तर राशन नाही'.

Friday, October 26, 2012

दिल्ली

"दिलवालों की दिल्ली, मशहूर है इस कर,
भूल ही जाते हैं लोग
ये मकबरों का शहर है"

Wednesday, October 10, 2012

चस्कों का बाज़ार

(इस कविता का उद्देश्य चस्कों और व्यसनों को बढ़ावा देना नहीं है बल्कि उन्हें दर्शाना है.)

चस्कों का बाज़ार है
ये ले एक तेरा
और ये मेरा

ज़रूरतों से हट जाए ध्यान
इस करके चस्कों को अपनाया है.
दल रोटी अब मेरे बस के बाहर है,
पर ये ले एक फ़ोन देता हूँ तुझे
जब भी भूक लगे
दुश्मन को कर लिया करना
गालियाँ ही सही
खाने को कुछ मिल जाएगा

ज़रूरतों से हट जाए ध्यान
इस करके चस्कों को अपनाया है.
घर-बागीचा अब मेरे बस के बाहर है,
पर ये ले कंप्यूटर देता हूँ तुझे
जब भी मन करे
खेल लेना इसी पर
नकली ही सही
कुछ खेत तो अपने होंगे

ज़रूरतों से हट जाए ध्यान
इस करके चस्कों को अपनाया है.
ख्वाब देखना अब मेरे बस के बाहर है,
पर ये ले नशा देता हूँ तुझे
नींद का नमो-निशां न हो
तो अपना लेना इसे ही
कुछ पल ही सही
चैन से मूँद लेना आँखें

ज़रूरतों से हट जाए ध्यान
इस करके चस्कों को अपनाया है.
वफ़ा अब मेरे बस के बाहर है,
पर ये ले रंगीन-मिज़ाजी देता हूँ तुझे
हर नए मोड़ पे
अपना लेना इसे ही
कुछ पल ही सही
ज़मीर की चुप्पी होगी

चस्कों के बाज़ार में
हर चीज़ बड़ी महँगी है
सस्ते हैं तो बस
भूख, छत, सपनें और प्यार,
बेचनेवाले ने रखा ही नहीं जिन्हें दुकानों में.

Tuesday, October 9, 2012

चुटकलों की थैली में
मेरी ये नज़्म भी डाल दीजे
हमदर्द भी आजकल
सिर्फ कहकहों पर ही दाद देते हैं

Thursday, August 9, 2012

इक बात कहूं तुम से

एक बात कहूं तुम से?
एक बात से सौ बातें
सौ बातों की इक बात
इक बात कहूं तुम से!


Should I tell you one thing? One thing that shows in a hundred things I do. One thing that is the gist of a hundred things I say. I say that thing to you!